Aman ki Asha

I’m perturbed after reading the news about the war-like situation brewing between India-Pak and the cheering of it in some quarters. Wrote this poem:       *अमन की आशा* जंग का ऐलान करके हैं खड़े सीना तान के छप्पन इंच चौड़ा हुआ है  वीरों के रक्तदान से  ऐ वतन के वासियों ना जंग सेContinue reading “Aman ki Asha”

तड़प

आसमान अमृत कलश करके बूँदों की बौछार प्रेम रस में डुबो देता हैं धरती का आकार। गर्जना से गूंज उठी, जब होती बादलों की टकरार, रोमांचित धरती अपनी खुशबू फैलाती दिशाएं चार । ख़त्म हो चला हैं अब खुशियों का वह त्यौहार। सूख रहा धरती का सीना, पड़ गए उनमें दरार। अब तो बादल भंवरोContinue reading “तड़प”

सूखी पाती

कभी सूखी पाती से पूछना उस ऊंची डाली का छोह। बिछड़ कर पीले होने पर वो हरियाली का मोह। तन सूखा हैं मन सूखा हैं पर जीवित उसकी आशा हैं। पड़ी हुई हैं गुमसुम सी पर याद अभी तक ताज़ा हैं। © Vidya Venkat (2006)

तुम

हलाक़ में अटकी रहे वो अल्फाज़ हो तुम, ज़िन्दगी भर भुला ना सकें वो ख्वाब हो तुम। उम्रें गुज़र जाएंगी शायद मुलाक़ात की उम्मीद में, रब से जो मांगी जाए वो दरख्वास्त हो तुम। हलाक़ में अटकी रहे वो अल्फाज़ हो तुम। ऊंची से ऊंची दीवारें पार की हमनें फिर भी तुझ तक ना पहुँचContinue reading “तुम”

A critical appraisal of India’s Maoist uprising

[First published in The Hindu dated 11/11/17] Fifty years after India’s first Naxalite uprising, the Maoist movement today has nearly disintegrated, with several movement leaders now dead, arrested or having surrendered. Ajay Gudavarthy’s edited collection of essays raises the vital question at this juncture: Is violence necessary for revolutionary change in a democracy? While notContinue reading “A critical appraisal of India’s Maoist uprising”