Aman ki Asha

I’m perturbed after reading the news about the war-like situation brewing between India-Pak and the cheering of it in some quarters. Wrote this poem:       *अमन की आशा* जंग का ऐलान करके हैं खड़े सीना तान के छप्पन इंच चौड़ा हुआ है  वीरों के रक्तदान से  ऐ वतन के वासियों ना जंग सेContinue reading “Aman ki Asha”

सूखी पाती

कभी सूखी पाती से पूछना उस ऊंची डाली का छोह। बिछड़ कर पीले होने पर वो हरियाली का मोह। तन सूखा है मन सूखा है पर जीवित उसकी आशा है। पड़ी हुई है गुमसुम सी पर याद अभी तक ताज़ा है। © Vidya Venkat (2006)

तुम

हलाक़ में अटकी रहे वो अल्फाज़ हो तुम, ज़िन्दगी भर भुला ना सकें वो ख्वाब हो तुम। उम्रें गुज़र जाएंगी शायद मुलाक़ात की उम्मीद में, रब से जो मांगी जाए वो दरख्वास्त हो तुम। हलाक़ में अटकी रहे वो अल्फाज़ हो तुम। ऊंची से ऊंची दीवारें पार की हमनें फिर भी तुझ तक ना पहुँचContinue reading “तुम”

Lines written on seeing a cow

What conspiracies are you hatching inside that big, horned head of yours? I can see that you have been contemplating some serious issue for quite some time. Is it the scarcity of fodder that has been bothering you or your master’s tyranny? The having to feed on wall posters, eating out of dustbins, and gettingContinue reading “Lines written on seeing a cow”