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Archive for the ‘poetry’ Category

Aman ki Asha

indiapak

I’m perturbed after reading the news about the war-like situation brewing between India-Pak and the cheering of it in some quarters. Wrote this poem:

 

 

 

*अमन की आशा*

जंग का ऐलान करके
हैं खड़े सीना तान के
छप्पन इंच चौड़ा हुआ है 
वीरों के रक्तदान से 

वतन के वासियों
ना जंग से यूं प्यार कर
दे जवानों की बलि यूं
इस मिट्टी को तू लाल कर

याद करना उस छवि को
जिनमें विधवाएं कईं
आँसुएँ पोछ रही जो
वीरों की माताएं कईं

जंग का करके जश्न यूं
वतन के वासियों
ना अमन को कर ख़त्म यूं
वतन के वासियों

© Vidya Venkat (2019)

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तड़प

dryearth

आसमान अमृत कलश करके बूँदों की बौछार
प्रेम रस में डुबो देता हैं धरती का आकार।
गर्जना से गूंज उठी, जब होती बादलों की टकरार,
रोमांचित धरती अपनी खुशबू फैलाती दिशाएं चार ।

ख़त्म हो चला हैं अब खुशियों का वह त्यौहार।
सूख रहा धरती का सीना, पड़ गए उनमें दरार।
अब तो बादल भंवरो के भांति मंडराते आते जाते हैं ,
और धरती, तुम फिर कब आओगे, केवल पूछे जाती हैं …

© Vidya Venkat (2005)

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dryleaf

कभी सूखी पाती से पूछना उस ऊंची डाली का छोह।
बिछड़ कर पीले होने पर वो हरियाली का मोह।

तन सूखा हैं मन सूखा हैं पर जीवित उसकी आशा हैं।
पड़ी हुई हैं गुमसुम सी पर याद अभी तक ताज़ा हैं।

© Vidya Venkat (2006)

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तुम

voice-ass

हलाक़ में अटकी रहे वो अल्फाज़ हो तुम,
ज़िन्दगी भर भुला ना सकें वो ख्वाब हो तुम।

उम्रें गुज़र जाएंगी शायद मुलाक़ात की उम्मीद में,
रब से जो मांगी जाए वो दरख्वास्त हो तुम।

हलाक़ में अटकी रहे वो अल्फाज़ हो तुम।

ऊंची से ऊंची दीवारें पार की हमनें
फिर भी तुझ तक ना पहुँच पाए, क्या राज़ हो तुम ?

चहचहाती भीड़ में खामोशियाँ हूँ ढूढ़ता
शोर में जो सुन ना पाएँ शायद वो आवाज़ हो तुम।

हलाक़ में अटकी रहे वो अल्फाज़ हो तुम।

© Vidya Venkat (2019)

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india_street_cows

Picture used for representative purposes. Source: pri.org 

What conspiracies are you hatching inside that big, horned head of yours?
I can see that you have been contemplating some serious issue for quite some time.
Is it the scarcity of fodder that has been bothering you or your master’s tyranny?
The having to feed on wall posters sometimes, eating out of dustbins, and getting whipped? 

I can understand your problem dear, but tell me, is this any solution?
You lift your wiggly tail upwards just when I’m about to cross you by
And splash hot, thick, yellow urine right in the middle of the road.
Now, what point is it that you are trying to get across, eh? 

I want you to use a little bit of common sense now. Is your mooing and dunging
And peeing in public gonna do you any good? You only end up messing up the streets
Our Government lays after much deliberation. You may claim your liberty to raise
Your tail as a mark of protest for all the pains that you undergo in everyday life,

But, I will not tolerate your nonsense dear. I can’t take your shit and crap!
Oh! How you remind me of these politicians who mess up civilian life for their own cause!

© Vidya Venkat (2005)

[Reproduced here from an old blog]

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