आज़ाद

जिन्हे कल तक मेरी बातों से एतराज़ था
उन्हे आज मेरी ख़ामोशी से नाराज़गी है।
मैं आज़ाद हूँ, मेरी आवाज़ भी अब
किसी की मर्ज़ी का मोहताज नही।

© Vidya Venkat


फितरत

जिन्हे ये जहान बुरा करार करता है
उनमें होती है खूबियां कई।
और जो खुद को अच्छा बतलाते हैं
उनमें होती है खामियां कई।

ओ दुनियावालों किसी की बातों में आकर
मत करना दूसरों को खुद से परे।
कहीं ऐसा न हो, अच्छाई और बुराई के बीच
कशमकश में इंसान अपनी फितरत खो बैठे…

© Vidya Venkat

सोचा तुम पे लिखूँ कविता

सोचा तुम पे लिखूँ कविता
पर शब्द नही मिलते हैैं।
वो सूर्योदय सा तेजस,
जो तुम्हारे चेहरे से छलक रहा था,
उसे अपनी मन की आँखों से
निहार रही हूँ ।
कैसा अनुभव था वह
जिसे मैं व्यक्त नही कर पा रही हूँ?
शायद मेरी कल्पना की आंच
तुम्हारी उस उज्जवलता के सामने
धीमी पड़ गई है।
सोचा तुम पे लिखूँ कविता
पर शब्द ही नही मिलते हैं…

© Vidya Venkat


ज़िंन्दा हूँ

मेरी कविताओं को केवल कविताएँ मत समझो।
ये इस बात का सबूत है कि साँसें चल रही हैं,
रगों में खून दौड़ रहा है, और धड़कनेें बरकरार हैं ।
मान लो लिख रही हूँ तो ज़िंन्दा हूँ ।
अगर इस कलम का सहारा ना होता
तो ना जाने क्या होता… 

© Vidya Venkat (2020)